
भजन संहिता 43
इंडियन रिवाइज्ड वर्जन
अध्याय सारांश
भजन 43 छलपूर्ण विरोध से प्रमाणीकरण मांगता है और पूछता है कि अस्वीकृति इतनी वास्तविक क्यों लगती है। प्रकाश और सत्य पवित्र पहाड़ी की ओर वापस मार्गदर्शक बनते हैं, जहां हतोत्साहित आत्मा नवीनीकृत उपासना और स्तुति की अपेक्षा करती है।
निर्देशनप्रमाणीकरणउपासनाआशा
1हे परमेश्वर, मेरा न्याय चुका43:1 मेरा न्याय चुका: दण्ड देने की बात नहीं है, मेरा मुकद्दमा लड़। और विधर्मी जाति से मेरा मुकद्दमा लड़; मुझ को छली और कुटिल पुरुष से बचा।
2क्योंकि तू मेरा सामर्थी परमेश्वर है, तूने क्यों मुझे त्याग दिया है? मैं शत्रु के अत्याचार के मारे शोक का पहरावा पहने हुए क्यों फिरता रहूँ?
3अपने प्रकाश और अपनी सच्चाई को भेज; वे मेरी अगुआई करें, वे ही मुझ को तेरे पवित्र पर्वत43:3 पवित्र पर्वत: सिय्योन पर्वत, जहाँ परमेश्वर की आराधना की जाती थी। पर और तेरे निवास-स्थान में पहुँचाए!
4तब मैं परमेश्वर की वेदी के पास जाऊँगा, उस परमेश्वर के पास जो मेरे अति आनन्द का कुण्ड है; और हे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, मैं वीणा बजा-बजाकर तेरा धन्यवाद करूँगा।
5हे मेरे प्राण तू क्यों गिरा जाता है? तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है? परमेश्वर पर आशा रख, क्योंकि वह मेरे मुख की चमक और मेरा परमेश्वर है; मैं फिर उसका धन्यवाद करूँगा।
इंडियन रिवाइज्ड वर्जन — CC BY-SA 4.0. Where these translations come from.
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