
भजन संहिता 11
इंडियन रिवाइज्ड वर्जन
अध्याय सारांश
भजन 11 सामाजिक नींवों के नष्ट होने पर घबराहट को अस्वीकार करता है। भजनकार शरण में रहता है, भरोसा करते हुए कि मानवीय आचरण परखा जाता है और सीधा न्याय अंततः हिंसा व छल का सामना करता है।
शरणसाहसन्यायपरीक्षा
1मैं यहोवा में शरण लेता हूँ; तुम क्यों मेरे प्राण से कहते हो “पक्षी के समान अपने पहाड़ पर उड़ जा11:1 पक्षी के समान अपने पहाड़ पर उड़ जा: इसका अभिप्राय है कि वह जहाँ था वहाँ उसकी सुरक्षा नहीं थी।”;
2क्योंकि देखो, दुष्ट अपना धनुष चढ़ाते हैं, और अपने तीर धनुष की डोरी पर रखते हैं, कि सीधे मनवालों पर अंधियारे में तीर चलाएँ।
3यदि नींवें ढा दी जाएँ11:3 यदि नींवें ढा दी जाएँ: यहाँ नींव का अर्थ है सत्य एवं धार्मिकता के महान सिद्धान्त जो समाज को थामे रहते हैं जैसे किसी भवन की नींव जो निर्माण को थामती है। तो धर्मी क्या कर सकता है?
4यहोवा अपने पवित्र भवन में है; यहोवा का सिंहासन स्वर्ग में है; उसकी आँखें मनुष्य की सन्तान को नित देखती रहती हैं और उसकी पलकें उनको जाँचती हैं।
5यहोवा धर्मी और दुष्ट दोनों को परखता है, परन्तु जो उपद्रव से प्रीति रखते हैं उनसे वह घृणा करता है।
6वह दुष्टों पर आग और गन्धक बरसाएगा; और प्रचण्ड लूह उनके कटोरों में बाँट दी जाएँगी।
7क्योंकि यहोवा धर्मी है, वह धार्मिकता के ही कामों से प्रसन्न रहता है; धर्मी जन उसका दर्शन पाएँगे।
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