A traveler pauses at branching paths near offered first fruits and a flourishing tree

नीतिवचन 3

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन
अध्याय सारांश
आत्मनिर्भरता के बजाय यहोवा पर भरोसा हर मार्ग को निर्देशित करता है। अध्याय नम्रता, उदार प्रथम फल, ग्रहणशील अनुशासन, और पड़ोसी की भलाई को उस बुद्धि के साथ जोड़ता है जो खजाने से अधिक बहुमूल्य और जीवन के वृक्ष के रूप में चित्रित है।
भरोसाउदारताअनुशासनजीवन का वृक्ष
1हे मेरे पुत्र, मेरी शिक्षा को न भूलना; अपने हृदय में मेरी आज्ञाओं को रखे रहना;
2क्योंकि ऐसा करने से तेरी आयु बढ़ेगी, और तू अधिक कुशल से रहेगा।
3कृपा और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएँ; वरन् उनको अपने गले का हार बनाना, और अपनी हृदयरूपी पटिया पर लिखना। (2 कुरि. 3:3)
4तब तू परमेश्वर और मनुष्य दोनों का अनुग्रह पाएगा, तू अति प्रतिष्ठित होगा। (लूका 2:52, रोम. 12:17, 2 कुरि. 8:21)
5तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना3:5 यहोवा पर भरोसा रखना: परमेश्वर की इच्छा में भरोसा रखना- सच्ची महानता का रहस्य अपनी सब चिन्ताओं, योजनाओं तथा भय से उभरना है। हम अपने स्वयं को अपना भाग्य विधाता समझते है तो अपनी ही समझ का सहारा लेते है।।
6उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।
7अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना। (रोम. 12:16)
8ऐसा करने से तेरा शरीर भला चंगा, और तेरी हड्डियाँ पुष्ट रहेंगी।
9अपनी सम्पत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की सारी पहली उपज देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना;
10इस प्रकार तेरे खत्ते भरे और पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डों से नया दाखमधु उमड़ता रहेगा।
11हे मेरे पुत्र, यहोवा की शिक्षा से मुँह न मोड़ना, और जब वह तुझे डाँटे, तब तू बुरा न मानना,
12जैसे पिता अपने प्रिय पुत्र को डाँटता है, वैसे ही यहोवा जिससे प्रेम रखता है उसको डाँटता है। (इफि. 6:4, इब्रा. 12:5-7)
13क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे,
14जो उपलब्धि बुद्धि से प्राप्त होती है, वह चाँदी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ शुद्ध सोने के लाभ से भी उत्तम है।
15वह बहुमूल्य रत्नों से अधिक मूल्यवान है, और जितनी वस्तुओं की तू लालसा करता है, उनमें से कोई भी उसके तुल्य न ठहरेगी।
16उसके दाहिने हाथ में दीर्घायु, और उसके बाएँ हाथ में धन और महिमा हैं।
17उसके मार्ग आनन्ददायक हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।
18जो बुद्धि को ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिये वह जीवन का वृक्ष बनती है; और जो उसको पकड़े रहते हैं, वह धन्य हैं।
19यहोवा ने पृथ्वी की नींव बुद्धि ही से डाली; और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।
20उसी के ज्ञान के द्वारा गहरे सागर फूट निकले, और आकाशमण्डल से ओस टपकती है।
21हे मेरे पुत्र, ये बातें तेरी दृष्टि की ओट न होने पाए; तू खरी बुद्धि और विवेक3:21 खरी बुद्धि और विवेक: निम्नलिखित वाक्य की बुद्धि एवं विवेक। अर्थात् बुद्धि और विवेक पर अपनी नजर इस प्रकार रखो, जैसे कोई अपनी अनमोल वस्तु की निगरानी करता है। की रक्षा कर,
22तब इनसे तुझे जीवन मिलेगा, और ये तेरे गले का हार बनेंगे।
23तब तू अपने मार्ग पर निडर चलेगा, और तेरे पाँव में ठेस न लगेगी।
24जब तू लेटेगा, तब भय न खाएगा, जब तू लेटेगा, तब सुख की नींद आएगी।
25अचानक आनेवाले भय से न डरना, और जब दुष्टों पर विपत्ति आ पड़े, तब न घबराना;
26क्योंकि यहोवा तुझे सहारा दिया करेगा, और तेरे पाँव को फंदे में फँसने न देगा।
27जो भलाई के योग्य है उनका भला अवश्य करना, यदि ऐसा करना तेरी शक्ति में है।
28यदि तेरे पास देने को कुछ हो, तो अपने पड़ोसी से न कहना कि जा कल फिर आना, कल मैं तुझे दूँगा। (2 कुरि. 8:12)
29जब तेरा पड़ोसी तेरे पास निश्चिन्त रहता है, तब उसके विरुद्ध बुरी युक्ति न बाँधना।
30जिस मनुष्य ने तुझ से बुरा व्यवहार न किया हो, उससे अकारण मुकद्दमा खड़ा न करना।
31उपद्रवी पुरुष के विषय में डाह न करना, न उसकी सी चाल चलना;
32क्योंकि यहोवा कुटिल मनुष्य से घृणा करता है, परन्तु वह अपना भेद सीधे लोगों पर प्रगट करता है।
33दुष्ट के घर पर यहोवा का श्राप और धर्मियों के वासस्थान पर उसकी आशीष होती है।
34ठट्ठा करनेवालों का वह निश्चय ठट्ठा करता है; परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है। (याकू. 4:6, 1 पत. 5:5)
35बुद्धिमान महिमा को पाएँगे, परन्तु मूर्खों की बढ़ती अपमान ही की होगी।

इंडियन रिवाइज्ड वर्जन — CC BY-SA 4.0. Where these translations come from.

Copyright © 2017, 2018, 2019 Bridge Connectivity Solutions. Supplied unaltered through eBible.org. Text unchanged, used under CC BY-SA 4.0.