
अय्यूब 25
इंडियन रिवाइज्ड वर्जन
अध्याय सारांश
बिल्दद परमेश्वर के प्रभुत्व और स्वर्ग की अनगिनत सेनाओं पर एक संक्षिप्त अंतिम भाषण देता है, जिनके सामने ऊंचाइयों में शांति स्थापित है। यदि चंद्रमा और तारे भी परमेश्वर की दृष्टि में शुद्ध नहीं हैं, वह पूछता है, तो एक मनुष्य, स्त्री से जन्मा कीड़ा, कैसे धर्मी हो सकता है?
बिल्दददिव्य प्रभुत्वमानवीय दुर्बलतासृष्टि
1तब शूही बिल्दद ने कहा,
2“प्रभुता करना और डराना यह उसी का काम है25:2 प्रभुता करना और डराना यह उसी का काम है: अर्थात् परमेश्वर को राज करने का अधिकार है और उसे श्रद्धा अर्पित करना आवश्यक है।; वह अपने ऊँचे-ऊँचे स्थानों में शान्ति रखता है।
3क्या उसकी सेनाओं की गिनती हो सकती? और कौन है जिस पर उसका प्रकाश नहीं पड़ता?
4फिर मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी कैसे ठहर सकता है? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह कैसे निर्मल हो सकता है?
5देख, उसकी दृष्टि में चन्द्रमा भी अंधेरा ठहरता, और तारे भी निर्मल नहीं ठहरते।
6फिर मनुष्य की क्या गिनती जो कीड़ा है, और आदमी कहाँ रहा जो केंचुआ है!”
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